मस्तराम याद है आपको !!

बात कल परसों की है .किसी काम के सिलसिले में मित्र नरेन्द्र के दफ्तर जा पहुँचा ..काम निबटाने के बाद बैठे बैठे बातों का दौर निकला फेसबुक वगैरह पर मेरे कमेंट को लेकर बात निकली तो फिर दूर तक जा पहुँचनी ही थी ..नरेन्द्र ने मुझसे कहा कि दादा आप अंतर्वासना जैसी चीजें भी पढ़ते हो ..आपकी एक कमेंट में इसका जिक्र आया था मैने कहा कि मुझे पढ़ने की इस हद तक दीवानगी है कि जिस कागज में समोसा आता है मैं एक दफा उसे भी देख लेता हूँ कि आखिर इसमें लिखा क्या है .हद तो ये है कि मेरे घर में सब को पता है कि किसी भी तरह का कागज फेंका न जाए जब तक मैं खुद मुआयना न कर लूँ ..हमारे घर की कामवाली तक भी कागज कोने में रख देती है .खैर बात निकली कि तो जिक्र आया कि मस्तराम पर भी एक फिल्म बनने जा रही है ..वर्तमान जनरेशन शायद मस्तराम से परिचित न हो तो उनके लिए बता दें कि मस्तराम के नाम से पत्रिकाओं का निकलती थीं ..ये पत्रिकाएं चौराहों फुटपाथ के अलावा किताब की दुकानों पर भी मिलती थीं लेकिन इन्हे इस तरह से रखा जाता था मानों गाँजा रखा गया हो ..दुकान वाले के पास जाकर फुसफुसाकर बोला जाता था कि भैया वो देना ..वो शब्द में ही ऐसा असर होता था कि दुकानदार किसी पेपर में लपेटकर एक बंडल ठीक उसी तरह पकड़ा देता जिस तरह आजकल आप विस्पर लेने जाओ तो दुकानदार काली पन्नी में आपको पैकेट थमाता है ..खैर किताब तो ले आते थे लेकिन अब पढ़ें कैसे तो किताबों के बीच छिपा कर पढ़ी जाती ..घर वाले लोग समझते कि हमारा बेटा तो खूब पढ़ रहा है उन्हे क्या पता होता कि बेटा तो मस्तराम है .. हमारे कई दोस्त तो पूरी किताब को बाथरुम में जाकर निबटाते थे ..और बिचारों की माँ समझती कि बेटे को कब्ज की शिकायत है तो उसी प्रकार का खाना देती लेकिन कब्ज का इलाज ही नही होता …एक और बात की मस्तराम की किताबें आधी से ज्यादा कीमत में वापस भी हो जाती थीं ..याने इन किताबों का धंधा न सिर्फ पाठकों के लिए बल्कि दुकानदार के लिए भी अच्छा सौदा था …सिर्फ एक बार का इन्वेस्ट और लगातार पैसे की बारिश …ठीक वैसे ही जैसे किसी लड़की की फेसबुक प्रोफाइल लाइक करो तो साला तीन महिने तक नोटीफिकेशन आता रहता है …इन किताबों को ऐसे छिपाकर रखा जाता था जैसे सोने के गहने भी नही छिपाए जाते ..पंलग में गद्दे के नीचे तो कहीं स्टोररूम में पुराने अखबारों के बीच तो कहीं और जिन्होने उस नस्ल को देखा है वो जानते हैं …इन किताबों का नाम भी ऐसा होता था कि आप सोच नही सकते ..दफा 302,भांग की पकौड़ी …वगैरह वगैरह इनकी किताबों पर नीला या हरा प्लास्टिक चढ़ा होता जिसे खोलकर देखने की इजाजत नही होती थी ..एक ही शर्त पर इसे खोला जा सकता था जबकि आप पैसे चुका दो ..
      अब आपको बता दें कि आखिर इन किताबों में होता क्या था तो ..सीधी भाषा में कहें कि इन किताबों में औरद मरद के रिश्ते के बारे में जानकारी होती थी ..एक किस्से को आधार बनाकर उसके आगे पीछे कहानी गढ़ी जाती थी लेकिन अगर हम आपको कहें कि विशुद्ध रुप से अश्लील न होकर भी ये कहानियाँ यौन भावनाएं को भड़काकर शांत करने में सक्षम थीं तो शायद गलत नही होगा ..दरअसल मस्तराम कोई एक लेखक नही होता था बल्कि कई  लेखक इनकी कहानियाँ लिखते थे लेकिन सबकी पहली पंसद एक ही नाम होता था मस्तराम..   यह नाम लोगों की पहली पंसद बना हुआ था ..हाँ उस वक्त कापीराइट जैसी चीजें होती थी लेकिन सबसे ज्यादा पढ़े जाने के बावजूद ये किताबें साहित्य की श्रेणी में अछूत मानी जाती थीं जैसे शहादत हसन मंटो को जीते जी कभी भी साहित्यकार नही माना गया .. लेकिन उनके बाद अधिकतर लेखकों ने उनकी शैली में लिखकर न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में काफी पैसा उगाहा ..तस्लीमा नसरीन जैसे लोग क्या लिखते हैं यही सब ना…कपडे़ के भीतर दिखते माँस को उधेड़कर लोंगो ने खुद को साहित्यकार मनवा लिया ..चलिए विषय पर लौटते हैं …तो बात करते हैं मस्तराम की वो लिखते जरुर थे अश्लील लेकिन सीधे सीधे शारीरिक अंगो का नाम लेने से आम तौर बचा जाता था जैसा कि आजकल की अश्लील वेबसाइट में लिखा जाता है बजाए इसके हथियार,सुनहरे स्तूप एक मखमली त्रिभुज जैसे संकेतों का सहारा लिया जाता था ..कुछेक किताबों में चित्र भी होते थे ..ये चित्र रेखाचित्र होते थे ..हाथ से बने हुए ..जिसमें खुजराहो की तरह आसन होते थे …इसके अलावा इनकी कहानियों में रिश्तों की पवित्रता का ध्यान रखा जाता था ..भाई बहन माँ बेटा के रिश्तों से बचा जाता था ..हाँ देवर भाभी जीजा साली के रिश्तों की बाते होती थी पड़ोसी से प्यार होता था ..लेकिन आजकल नेट पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो तो हद से भी ज्यादा गया गुजरा है हालात तो ये हैं हाइकोर्ट को सवाल करना पड़ रहा है ..
      मस्तराम का अंत समय आ चुका था…अब बाजार में ऐसी किताबे मिलने लगी थी जिसमें फिंरगी औरतो मर्दों के सैक्स करते चित्र होते ..ये किताबे विशेष आग्रह पर पास के महानगर से बुलवाई जाती ..चोरी छिपे इनका धंधा होता ..किताबें महँगी होती ..तो वहीं कुछ लोग इन्हे किराए पर देते एक दिन का किराया बीस रुपए होता लेकिन आदमी ये किताबे लेता ..पास के बाथरुम में या सुलभ शौचालय में जाता और देखकर पाँच दस मिनट बाद वापस कर देता …ये इंटरनेट और मोबाइल के आने के पहले की बात है मस्तराम का पतन शुरु हो चुका था ..अब बाजार में सीडी आने लगी थीं ..सीडी में सन्नीलिओन की पूर्वजें नजर आने लगी थी ..किराए पर लेकर लोगों ने इन्हे खूब देखा लेकिन वो जादू पैदा न हो सका जो मस्तराम में होता था ..सीडी देखने का वो दौर भी अलग था ..सारे दोस्त पहले से तय करते सीडी लेकर आते फिर किसी ऐसे दोस्त का घर खोजा जाता जहाँ आसपास का इलाका सुनसान हो ..फिर कमरा बंद कर डरते डरते फिल्म देखी जाती ..हर आहट पर नजर रहती किसी ने दरवाजा खटखटाया तो पहले दमदार आवाज वाला शख्स पूछता कौन है ..इस दौरान एक शख्स सीडी बाहर निकालता दूसरा उसे छिपाता तो तीसरा किसी सामाजिक फिल्म को लगाकर चालू करता …जब तक दरवाजा खुलता तब तक लता दीदी की आवाज में हीरोइन गाना गा रही होती …
      अब तो नेट और मोबाइल का दौर है लेकिन मेरे दोस्तों की राय पर गौर करें तो अब वो मजा नही रहा जो मासूमियत और कला के साथ मस्तराम बयाँ कर जाते थे …वो मस्तराम लगता नही कि वो एक शख्स था या अनेक ..वो मस्तराम न जाने उस परंपरा के कितने लेखकों ने इस तरह का साहित्य रचा ..लगता नही कि इन्हे कभी उनकी मेहनत और रचना धर्मिता का पारिश्रमिक भी सही रुप से मिल पाया हो ..जरुरी है कि फिल्म इस परम्परा के लेखकों के साथ न्याय कर पाए …और दिखा पाए कि उनका योगदान क्या रहा ..जिस तरह से खजुराहो के मंदिरों के बाहर बनी मूर्तियों ने योगदान दिया है कुछ वैसा ही योगदान मस्तराम जैसे लेखको ने दिया है कोई से माने या न माने सच तो है ही …  

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